राबर्ट्सगंज लोकसभा चुनाव – एक अनुभव

आइपीएफ द्वारा चलाए एजेंडा लोकसभा अभियान ने राबर्ट्सगंज लोकसभा और दुद्धी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा गठबंधन को हराने में मदद की

सोनभद्र| उत्तर प्रदेश का राबर्ट्सगंज लोकसभा क्षेत्र अपने आप में एक विशेष क्षेत्र है। इसमें सोनभद्र जनपद की चार और चंदौली जनपद की चकिया विधानसभा आती है। यहां एक तरफ उच्च तकनीकी वाले बिजली उत्पादन ईकाईयां, अल्युमिनियम, सीमेंट, केमिकल्स और कार्बन प्लांट जैसे उद्योग है। वही आपको लकड़ी के हल बैल से होने वाली पिछड़ी खेती भी दिखाई देगी। आदिवासी-दलित बाहुल्य इस क्षेत्र में 1 जून को होने वाले मतदान से करीब डेढ़ महीने पहले ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की केंद्रीय टीम ने एजेंडा लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर जन अभियान का संचालन शुरू किया। इस अभियान में भाजपा को इस चुनाव में हराना और जन मुद्दों पर गोलबंद होना क्यों जरूरी है, इस पर जनता के बड़े हिस्से के साथ संवाद किया गया।
घोरावल विधानसभा से शुरू हुए इस जन अभियान में इस क्षेत्र में पड़ने वाले सोनभद्र जिले के दसों ब्लॉकों घोरावल, करमा, राबर्ट्सगंज, चतरा, नगंवा, कोन, चोपन, दुद्धी, म्योरपुर, बभनी और चंदौली जनपद के नौगढ़, चकिया, शहाबगंज के लोगों, यहां के प्रमुख औद्योगिक केन्द्रों के मजदूरों व कर्मचारियों, बार एसोसिएशनों व वकीलों और व्यापारियों और छोटे-मझोले उद्यमियों के साथ संवाद किया गया। संवाद में दिखा कि समाज के सभी तबकों में प्रमुख रूप से महंगाई, रोजगार और संविधान की सुरक्षा का सवाल बना हुआ था। इस अभियान के दौरान दो बार 12 मई को राबर्ट्सगंज और 26 मई को चकिया में दो बड़ी कार्यकर्ता बैठक भी की गई। जिसमें अभियान की समीक्षा की गई और राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार विमर्श किया गया। इन बैठकों में हमने पाया कि राबर्ट्सगंज लोकसभा क्षेत्र में किया जा रहा यह प्रयोग माओवादियों द्वारा किए गए चुनाव बहिष्कार और सामाजिक नागरिक संगठनों द्वारा महज मुद्दा उठाने के प्रयोग से पूर्णतया भिन्न है। इस अभियान में बड़े पैमाने पर जनता की भागेदारी हुई है, भाजपा को हराने का वातावरण तैयार हुआ है और इस अभियान ने इस संसदीय क्षेत्र को राष्ट्रीय चर्चा के केन्द्र में लाने का काम किया है। बैठक में इंडिया गठबंधन के सपा प्रत्याशी को लोकसभा और दुध्दी विधानसभा में समर्थन देने का फैसला लिया गया।
अभियान में 5 किलो राशन और अन्य सरकारी सुविधाओं को देने की सरकारी मदद के जरिए वोटबैंक बनाने की भाजपा की कोशिश का भंडाफोड किया गया। जनता को बताया गया कि यह मदद आपके ही टैक्स के पैसे से दी जा रही और यह कोई खैरात नहीं आपका अधिकार है। दलितों खासकर खेत मजदूरों में इससे जागृति आई और उन्होंने कई जगह भाजपा के विरूद्ध वोट किया। कोन ब्लॉक के सोन नदी के किनारे स्थित गांवों में निषाद जाति के नौजवानों से हुए संवाद में उन्होंने बताया कि पिछली कई सरकारों से सोन व कनहर नदी में बालू खनन का ठेका खनन माफियाओं को देने के चलते उनका बालू खनन का परम्परागत कार्य खत्म हो गया है और मजबूरीवश उन्हें पलायन करना पड़ता है। बैठक में बात उठी कि यदि यहां की नदियों में बालू खनन के कार्य को स्थानीय निवासियों की सहकारी समितियों को दे दिया जाए और बड़ी मशीनों की जगह मैनुअल खनन कराया जाए तो पर्यावरण और नदियों की सुरक्षा तो होगी ही साथ ही साथ लाखों लोगों के रोजगार का भी प्रबंध हो जाएगा।
इसी तरह चतरा ब्लॉक के गांव सिलथम पटना में जब बाहर जाने वाले मजदूरों से संवाद किया गया तो उन्होंने बताया कि कोरोना के बाद आमतौर पर दूसरे राज्यों में जहां वह काम करने जाते हैं वहां काम के घंटे 12 कर दिए गए हैं। इस क्षेत्र के औद्योगिक केंद्रों ओबरा, अनपरा, शक्ति नगर, बीजपुर और रेनुकूट में ठेका मजदूरों की बैठकें की गई। जिसमें मजदूरों की तरफ से यह बात आई कि 400 रूपए की प्रतिदिन मजदूरी में इस महंगाई में अपने परिवार की जीविका चला पाना उनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। मजदूरों ने यह भी कहा कि चाहे किसी भी दल की सरकार हो मजदूरों की हालत में बदलाव नहीं होता उनका शोषण इसी तरह बद्दस्तूर जारी रहता है ऐसे में मजदूरों को क्या करना चाहिए? संवाद में यह बात की गई कि मजदूरों को अपने हितों को पूरा करने के लिए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत तो बनानी ही होगी। लेकिन तात्कालिक तौर पर कारपोरेट घरानों के हितों को पूरा करने के लिए मजदूरों को आधुनिक गुलामी में डालने वाली भाजपा को हराना बेहद जरूरी है।
अभियान में घोरावल के कोल आदिवासी बाहुल्य गांवों में दौरा करने के दौरान इस जाति के लोगों में उनकी जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल न करने पर आक्रोश दिखाई दिया। कोल जाति के ही लोगों का कहना था कि केन्द्र सरकार ने कोल को जनजाति की सूची में शामिल करने के प्रस्ताव को लौटा दिया लेकिन सांसद पकौड़ी लाल कोल ने इस पर कुछ नहीं किया। जबकि कोल जनजाति का दर्जा न मिलने के कारण जंगल की पुश्तैनी जमीन पर वनाधिकार कानून के लाभ से वंचित हो रहे हैं और सरकारी नौकरियों में भी उनका उचित प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है। चुनाव परिणाम में भी कोल बाहुल्य कई गांव में एनडीए प्रत्याशी की हार हुई है।
पूरे अभियान को बाद के दौर में आइपीएफ की केन्द्रीय टीम ने दुद्धी विधानसभा में केंद्रित किया था। इस विधानसभा में लोकसभा के साथ विधानसभा का उपचुनाव भी हो रहा था। दरअसल इस विधानसभा में भाजपा ने एक नाबालिग लड़की से रेप के आरोपी व्यक्ति को टिकट देकर विधायक बनवाया था, जिसे अदालत ने 25 साल की सजा दी परिणामतः यह सीट रिक्त हो गई थी। इस क्षेत्र में आइपीएफ टीम के प्रचार के साथ ही नौजवान लड़कियों की युवा मंच टीम द्वारा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य के सवाल पर चले प्रचार अभियान ने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया।
यह विधानसभा आदिवासी बाहुल्य है और बेहद पिछड़े हुए क्षेत्र में आती है। यहां के हर गांव से करीब 90 प्रतिशत लड़के दूसरे प्रदेशों में काम करने को जाने के लिए मजबूर है। स्थिति तो यह है कि कई आदिवासी लड़कियां रेडीमेड गारमेंट्स के कारखाने में बेंगलुरु जाकर काम कर रही है। रोजगार यहां का एक प्रमुख प्रश्न है और इसे हल करने के प्रति सरकार की कोई रुचि नहीं दिखाई देती। संवाद में यह बात उठी यदि दुद्धी क्षेत्र में किसानों की सिंचाई की व्यवस्था के लिए कनहर बांध से नहरों का निर्माण किया जाए, बरसाती नालों पर सीरीज चेक डैम बनाकर पानी का जल संचय किया जाए तो यहां की खेती उन्नत होगी और लोगों की आजीविका का इंतजाम होगा। इस क्षेत्र से जो बैंकों में जमा पूंजी का पलायन हो रहा है उसे यहां के नौजवानों को बिना ब्याज के कर्ज के रूप में दिया जाए ताकि वह छोटे-छोटे उद्योग धंधे कर सके। लखपति दीदी बनाने की जुमलेबाजी ही न की जाए बल्कि महिला स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख तक का बिना ब्याज का कर्ज दिया जाए तो गांव-गांव दोनापत्ता, दिया सिलाई, अगरबत्ती, मोमबत्ती, साबुन जैसे लधु कुटीर उद्योगों को स्थापित कर रोजगार का इंतजाम किया जा सकता है। इस क्षेत्र में विद्युत तापीय परियोजनाओं से बड़े पैमाने पर निकलने वाली फ्लाई ऐश से ईट बनाने के कारखाने खड़े किए जाए तो नौजवानों के रोजगार का सृजन हो सकता है। इसी प्रकार जंगल की खाली पड़ी हुई जमीनों पर फलदार वृक्ष लगाने के लिए स्थानीय निवासियों की सहकारी समितियां को दिया जाए और यहां की खेती में सहकारीकरण को बढ़ावा दिया जाए तो आजीविका का इंतजाम भी होगा और पलायन भी रुकेगा।
अभियान के दौरान दिखा कि मनरेगा भी पूरे तौर पर ठप्प पड़ी है। बाजार दर से भी बेहद कम मजदूरी मात्र 238 रूपए रोज, उसके भी लम्बे समय तक बकाए रहने और आनलाइन हाजरी जैसी तकनीकी कठिनाईयों ने इस योजना के प्रति मजदूरों की रूचि को घटाने का काम किया है। इसे भी बेहतर ढंग से चलाकर पर्याप्त काम व सम्माजनक मजदूरी की गारंटी की जाए तो लोगों की इसमें रूचि पैदा होगी। हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने, रोजगार को मौलिक अधिकार बनाने, ठेका प्रथा को खत्म करने और रोजगार हेतु संसाधन जुटाने के लिए उच्च अमीरों पर उत्तराधिकार और सम्पत्ति कर लगाने का सवाल गांवों में उठाया गया जिसके प्रति नौजवानों का आकर्षण भी दिखा। इस अभियान में सैकड़ों नौजवान लड़के और लड़कियां युवा मंच के ग्रुप के साथ जुड़े।
युवा मंच की टीम ने अभियान के दौरान देखा कि पढ़ने की इच्छा के बावजूद बड़े पैमाने पर आदिवासी लड़कियों को अपनी शिक्षा बीच में ही छोडनी पड़ रही है। दरअसल 25 लाख की आबादी वाले सोनभद्र जनपद में महज तीन सरकारी डिग्री कॉलेज हैं। जिसमें एक लड़कियों का राबर्ट्सगंज में डिग्री कॉलेज है। बभनी के पोखरा में सरकारी डिग्री कॉलेज पिछले 5 सालों से बनकर तैयार है लेकिन उसमें शिक्षा का कार्य नहीं शुरू किया गया। प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ना बेहद महंगा है और ज्यादातर प्राइवेट कालेजों में अध्यापक तक नहीं है। ऐसे में जिले में दो और म्योरपुर में आदिवासी लड़कियों के लिए आवासीय व निःशुल्क शिक्षा के लिए कम से कम एक सरकारी डिग्री कॉलेज का सवाल प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा। इस क्षेत्र में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की भी हालत खस्ता है ज्यादातर विद्यालयों में अध्यापक नहीं है और वह शिक्षा मित्रों के बदौलत ही चल रहे है। यही हाल स्वास्थ्य व्यवस्था का भी है। ब्लाकों में बने सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रिफरल सेंटर बने हुए है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तय मानक के अनुरूप विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं विशेष तौर पर स्त्री रोग विशेषज्ञ जैसे डॉक्टरों का घोर अभाव है। पठारी-पहाड़ी इस क्षेत्र में दो-तीन गांवों के कलस्टर पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सीएचसी में पद के अनुरूप विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति और सभी तरह की जांच व दवा की व्यवस्था करने की बात युवा मंच के लोगों ने उठाई।
यहां शुद्ध पेयजल का भी बहुत बड़ा संकट रहता है आज भी आदिवासी इलाकों में चुआड़, कच्चे कुएं, बरसाती नालों और बांध से लोग पानी पीने के लिए मजबूर है। रासपहरी, कुसम्हा, आश्रम, डडीयारा जैसे कई ऐसे गांव है जहां पानी पीने के कारण लोग फ्लोरोसिस जैसी बीमारियों से विकलांग हो गए हैं और हर वर्ष जहरीले पानी से मौतें होती हैं। गौरतलब है कि जहरीले पानी से मौतों और विकलांगता के सवाल पर हमारी पहल पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने दौरा किया था। जिसके बाद लगे आरो प्लांट और फ्लोरोसिस को रोकने के लिए हैंडपंप के साथ लगे फिल्टर प्लांट आज ज्यादातर खराब पड़े हुए हैं। आदिवासियों की जिदंगी से जुड़ा जल, जंगल, जमीन पर अधिकार का सवाल हल करने के लिए बने वनाधिकार कानून को भी यहां विफल कर दिया गया था। दो-दो बार हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी इसे हल कर आदिवासियों और वनाश्रितों को पुश्तैनी जमीन पर अधिकार नहीं दिया गया।
संवाद के दौरान कनहर विस्थापितों के साथ भी बातचीत की गई और वह अपने को ठगा महसूस कर रहे थे। मुख्य बांध के निर्माण के बाद विस्थापित सभी गांव जलमग्न हो गए बावजूद इसके सैकड़ो लोगों को अभी भी विस्थापन पैकेज नहीं दिया गया और जिन लोगों का नाम सूची में छूटा हुआ था उसे भी नहीं जोड़ा गया। अमवार की कनहर विस्थापित कॉलोनी में षिक्षा-स्वास्थ्य, सड़क, शुद्ध पेयजल जैसी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं का अभाव है। हालत इतनी बुरी है कि नहरों के निर्माण, बांध के शेष कार्य को पूरा करने और विस्थापन पैकेज के भुगतान के लिए जरूरी 1050 करोड़ रूपए का भुगतान प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से दो वर्षाे से लम्बित है। ऐसे में विस्थापितों को अपने भविष्य की चिंता थी और उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई एवं जल शक्ति मंत्री द्वारा उनकी सभा करने के बावजूद इस चुनाव में विस्थापितों ने भाजपा की राजनीति को नकार दिया।
आइपीएफ द्वारा चले इस अभियान ने भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी अपना दल प्रत्याशी को हराने में मदद की। पूरे चुनाव में यह दिख रहा था कि भाजपा के खिलाफ जनता चुनाव लड़ रही है। जनता नायक बनकर उभरी और कमजोर संगठन और समन्वय की स्थितियों के बावजूद इंडिया गठबंधन के सपा प्रत्याशी राबर्ट्सगंज लोकसभा क्षेत्र और दुद्धी विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में जीते। राबर्ट्सगंज लोकसभा क्षेत्र में आने वाली दुद्धी में 43692, राबर्ट्सगंज में 20881, घोरावल में 28403, ओबरा में 4760 और चकिया में 31607 के अंतर से पांचों विधानसभाओं में जीत हासिल हुई। अब जो रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य, जमीन, महंगाई, पर्यावरण की रक्षा और मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा जैसे जन मुद्दे इस चुनाव के दौरान उभरे हैं इससे लोगों के अंदर एक नई जागृति आई है और लोगों को उम्मीद है कि जो जनप्रतिनिधि चुने गए हैं वह इन सवालों पर पहल लेगें। साथ ही इन जनमुद्दों के हल के लिए जन राजनीति को खड़ा करने भी पृष्ठभूमि इस चुनाव में तैयार हुई है|

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