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समस्त क्षेत्रवासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं- अरशद खान ( ग्रा0 वि0 अ0)

बहार आई शोरिश जुनूने फ़ितना सामाँ की,
इलाही खैर करना तू मेरे जेबो-गिरेबाँ की ।

सही जज़बाते हुर्रियत कहीं मेटे से मिटते हैं,
अबस हैं धमकियाँ दारो-रसन की और जिंदां की ।

वह गुलशन जो कभी आबाद था गुजरे जमाने में,
मैं शाख-ए-खुश्क हूँ हाँ-हाँ उसी उजड़े गुलिसतां की ।

नहीं तुमसे शिकायत हमसफीराने चमन मुझको,
मेरी तकदीर ही में था कफस और कैद जिंदां की ।

करो जब्ते-मुहब्बत गर तुम्हें दावाए-उल्फत है,
खामोशी साफ बतलाती है ये तसवीरे-जाना की ।

यूं ही लिखा था किस्मत में चमन पैराए आलम ने,
कि फसले-गुल में गुलशन छूट कर है कैद जिंदां की ।

जमीं दुश्मन जमां दुश्मन जो अपने थे पराये हैं,
सुनोगे दास्तां क्या तुम मेरे हाले-परीशां की ।

ये झगड़े और बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ,
ये तफ़रीके-अबस है तुममे हिन्दू और मुसलमाँ की ।

सभी सामाने-इशरत थी मज़े से अपनी कटती थी,
वतन के इश्क़ ने मुझको हवा खिलवाई जिंदां की ।

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